एफिलिएट मार्केटिंग – अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी लगभग हर ई-कॉमर्स कंपनी अपना एफिलिएटेड प्रोग्राम चलाती है। एफिलिएट मार्केटिंग में अपने ब्लॉग, वेबसाइट जैसे ऑनलाइन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के प्रोडक्ट्स को प्रमोट करना होता है। ऐसा करने के बाद, जब भी कोई यूजर आपके द्वारा प्रमोट किये गए लिंक पर क्लिक करके कोई प्रोडक्ट खरीदता है तो उस प्रोडक्ट के मूल्य का कुछ प्रतिशत आपको कमीशन के रूप में मिल जाता है|

कुछ लोगों को गूगल ऐडसेंस के बारे में कोई भी जानकारी नहीं होती है, जिसके कारण उनको पता ही नहीं होता है कि गूगल ऐडसेंस का इस्तेमाल करके पैसा कैसे कमाते हैं | दोस्तों गूगल ऐडसेंस गूगल का एक सबसे बेहतरीन जाना मना फ्री प्रोग्राम होता है जिसका इस्तेमाल करके लाखों लोग घर पर बैठकर लाखों रुपए कमाते हैं | गूगल ऐडसेंस एक ऐसा प्रोग्राम होता है जो हमारी खुद की साइट पर डालने के बाद लोग इस प्रोग्राम पर क्लिक करते हैं |
अगर आप एक Programmer हैं और आपको Apps Design और Coding(Java, C++) करना आता है तो आप अपना खुद का App बना कर बहुत पैसे कमा सकते हैं। बस आपको एक ज़बर्स्दस्त App बनाने की ज़रुरत है और उसे Google Play या App Store पर Publish कर दीजिये। आप अपने App को Pay Per Download भी बना सकते हैं या Admob Ads से पैसे भी कमा सकते हैं। आप मोबाइल फ़ोन के लिए Ebook App भी बना सकते हैं और उसे App store पर बेच सकते हैं।

ऑनलाइन बुक राइटिंग – पहले जहाँ बुक लिखकर पब्लिश करवाना किसी टेढ़ी खीर जैसा मुश्किल लगता था वहीँ आज इंटरनेट के इस दौर में अगर आप अपनी बुक लिखना चाहते हैं तो बिना किसी खर्च के किसी भी ई बुक पब्लिशिंग वेबसाइट पर फ्री में अपनी ई-बुक पब्लिश करके ऑनलाइन बेच सकते हैं। अमेज़न, फ्लिपकार्ट, ईबे जैसी ई-कॉमर्स वेबसाइट पर ई -बुक्स को बड़ी आसानी से बेचा जा सकता है।


एक पारंपरिक भारतीय व्यवस्था में गुरु-शिष्य का रिश्ता एक बहुत ही पवित्र रिश्ता माना जाता था, जहाँ गुरु या शिक्षक अपने छात्रों में, आध्यात्मिक, वैदिक, नैतिक और अकादमिक शिक्षाओं को संचारित करते थे। गुरु शब्द का अर्थ एक अंधेरे में फंसे हुए व्यक्ति को ज्योतिमान करना (गु का अर्थ है, अंधकार और रू का अर्थ प्रकाश) है। संपूर्ण उस समय शिक्षा का उद्देश्य उच्च नैतिक महत्व से संतुलित व्यक्तित्व में तथा अज्ञानता को एक ज्ञानता में बदलना होता था। इसके बदले में छात्र अपने गुरुओं के घर के कार्यों में सहायता करते थे और जो समर्थ होता था वह गुरू दक्षिणा के रूप में धन का भुगतान करता था। यह पारस्परिक संबंध शिक्षक के ज्ञान और छात्र की आज्ञाकारिता पर आधारित था। ऐसे गुरु-शिष्य संबंध में, एक सक्षम गुरु के कंधों पर सब कुछ छोड़ दिया जाता था, जो एक निर्माता के रूप में अभिनय करके, अपने शिष्यों या छात्रों को एक नई आकृति प्रदान करता था।
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